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प्रतिरोध को राजनीतिक संघर्ष बनाने की चुनौती

किसान और मजदूर संगठनों के एक मंच पर आने से 16 फरवरी का प्रतिरोध अधिक प्रभावशाली हो जाएगा। इसके बावजूद इस उम्मीद का कोई आधार नहीं है कि इससे किसान या मजदूर वर्गों को अपनी मांगों को मनवाने में कोई सफलता मिलेगी। इस प्रतिरोध से अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को पराजित कर देने की जमीन तैयार होगी, इसकी आशा भी करने का कोई ठोस आधार नहीं है। ऐसे प्रतिरोध पहले भी हुए हैं, जो प्रतीकात्मक बन कर रह गए। इस बार भी यही संभावना है कि पहले जैसी कहानी दोहराई जाएगी।इसलिए किसान और मजदूर संगठनों को इस बारे में आत्म-मंथन करने की जरूरत है।
संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने जालंधर में अपने राष्ट्रीय अधिवेशन में अगले 16 फरवरी को ग्रामीण बंद यानी देहाती इलाकों में पूर्ण हड़ताल का आह्वान किया। उसके बाद उसने ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधियों से गुजारिश की कि वे भी इस प्रतिरोध में शामिल हो जाएं। इसे ट्रेड यूनियनों ने सहज स्वीकार कर लिया। इस तरह अगले महीने की 16 तारीख को किसान और मजदूर एकजुट होकर नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों के प्रति अपना विरोध जताएंगे।
एसकेएम इस बात से खफा है कि तीन किसान विरोधी कृषि कानूनों के खिलाफ उसके मशहूर किसान आंदोलन को खत्म कराने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो वायदे किए थे, उन्हें मोदी सरकार ने नहीं निभाया। इस तरह किसान महसूस करते हैं कि उनके साथ विश्वासघात हुआ। जालंधर सम्मेलन के बाद जारी अपने घोषणापत्र में एसकेएम ने अपनी ठोस मांगे सामने रखी हैं। इनमें शामिल है:
कृषि और कृषि आधारित उद्योगों के विकास के लिए ऐसी वैकल्पिक नीति बने, जो कॉरपोरेट मोनोपॉली के शिकंजे से मुक्त हो।
कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश हो और पैदावार खरीदारी के लिए सहकारिताओं का गठन हो, ताकि किसानों को अपने उत्पाद का लाभकारी मूल्य मिल सके।
मजदूरों के लिए कम से कम उतने वेतन की गारंटी हो, जिससे वे गरिमा के साथ अपना जीवन जी सकें।
आबादी के सभी वर्गों के लोगों के लिए पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर अमल हो।
यह स्पष्ट है कि किसान संगठनों को उम्मीद नहीं है कि वर्तमान भारतीय जनता पार्टी की सरकार उनकी मांगों पर गौर करेगी। इसलिए एसकेएम ने किसानों का आह्वान किया है कि अगले आम चुनाव में वे कॉरपोरेट समर्थक, किसान विरोधी भाजपा सरकार के खिलाफ मतदान कर भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए को सत्ता से बाहर कर दें।
दस ट्रेड यूनियनों के साझा मोर्चे (जिसमें आरएसएस से जुड़ा भारतीय मजदूर संघ शामिल नहीं है) की इन मुद्दों और भाजपा सरकार के बारे में एसकेएम के आकलन से सहमति रही है। अब चूंकि वह भी 16 फरवरी के प्रतिरोध का हिस्सा बन गया है, तो जाहिर है कि इस कार्यक्रम की मांगों में मजदूर संगठनों की अपनी खास मांगें भी शामिल हो गई हैँ।
अनुमान लगाया जा सकता है कि किसान और मजदूर संगठनों के एक मंच पर आने से 16 फरवरी का प्रतिरोध अधिक प्रभावशाली हो जाएगा। इसके बावजूद इस उम्मीद का कोई आधार नहीं है कि इससे किसान या मजदूर वर्गों को अपनी मांगों को मनवाने में कोई सफलता मिलेगी। इस प्रतिरोध से अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को पराजित कर देने की जमीन तैयार होगी, इसकी आशा भी करने का कोई ठोस आधार नहीं है। ऐसे प्रतिरोध पहले भी हुए हैं, जो प्रतीकात्मक बन कर रह गए। इस बार भी यही संभावना है कि पहले जैसी कहानी दोहराई जाएगी।
इसलिए किसान और मजदूर संगठनों को इस बारे में आत्म-मंथन करने की जरूरत है कि उनके मिसाल बने संघर्ष भी आखिर कोई ऐसा आधार क्यों नहीं बना पाए, जिससे सरकार नीतिगत दिशा बदलने के लिए मजबूर हो जाए?
ऐसा नहीं है कि प्रतीकात्मक प्रतिरोध का कोई प्रभाव या महत्त्व नहीं होता। लेकिन ऐसी लड़ाइयां तभी कुछ हासिल कर पाती हैं, जब लिबरल डेमोक्रेसी एक न्यूनतम रूप में भी काम कर रही होती है। जब सत्ता के लगभग तमाम केंद्रों पर किसी खास राजनीतिक दल के माध्यम से शासक वर्ग कब्जा कर लेता है, तब ऐसे संघर्षों की सफलता की गुंजाइश सिकुड़ जाती है। खासकर अगर वह राजनीतिक दल ऐसा हो, जो रोजी-रोटी की रोजमर्रा की समस्याओं को ताक पर रखते हुए भावनात्मक मुद्दों के जरिए राजनीतिक बहुमत जुटाने में सफल होने की क्षमता रखता हो। उस हाल में धीरे-धीरे लिबरल डेमोक्रेसी को सुनिश्चित करने वाली तमाम संस्थाओं पर भी शासक वर्ग का पूर्ण कब्जा हो जाता है। फिलहाल, भारत में यह स्थिति तैयार हो चुकी है। यहां इस समय शासक वर्ग से सीधा मतलब कॉरपोरेट मोनोपोली से है, जिसने अपनी पूरी ताकत भाजपा के पीछे झोंक रखी है और भाजपा सरकार खुल कर जिसके हित में काम कर रही है।
किसान आंदोलन को इस बात का श्रेय है कि उसने इस परिघटना से भारत की बनी राजनीतिक अर्थव्यवस्था (पॉलिटिकल इकॉनमी) की सही समझ दिखाई थी। जालंधर घोषणपत्र में भी उसने अपने आक्रोश का निशाना सही जगह पर साधा है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस समझ से ट्रेड यूनियनें भी सहमत होंगी। लेकिन उनकी कमजोरी यह है कि वे लिबरल डेमोक्रेसी के सिकुडऩे और वर्तमान राजनीतिक-अर्थव्यवस्था के खिलाफ संघर्ष की प्रभावी रणनीति तय कर पाने में विफल रही हैं। इसके कुछ कारणों की पड़ताल हम कर सकते है:
अपने लंबे इतिहास में ट्रेड यूनियनें संगठित मजदूर वर्ग से आगे नहीं निकल सकीं। जबकि भारत में कभी भी संगठित क्षेत्र के कर्मियों की संख्या कुल कामगर वर्ग के तकरीबन दस फीसदी तक सीमित रही। इस तरह ट्रेड यूनियनों के संघर्ष का मतलब कामगार वर्ग के दशमांश तक ही सीमित रहा है।
भारत में कुल कामगार वर्ग से तुलना करें, तो संगठित क्षेत्र के कर्मचारी अपेक्षाकृत लाभ की स्थिति में नजर आएंगे। दरअसल, गुजरते दशकों के साथ वे मध्य वर्ग का हिस्सा बन गए। इस तरह व्यापक श्रमिक वर्ग के साथ एकजुटता की भावना टूट गई। संवेदना के स्तर पर आज वे सुविधाभोगी तबकों में शामिल नजर आते हैं। ऐसे ट्रेड यूनियनों के साथ वे सिर्फ अल्पकालिक आर्थिक या नौकरी संबंधी लाभों के लिए जुड़े रहते हैं।
टेक्नॉलॉजी के विकास के साथ आउटसोर्सिंग एक बड़ी परिघटना बन गई। इस तरह संगठित क्षेत्र के उद्योग भी असंगठित मजदूरों से अपना काम चलाने लगे। इससे पैदा हुई नई परिस्थिति का तोड़ ट्रेड यूनियनें नहीं ढूंढ सकी हैं।
गिग कारोबार के मौजूदा दौर ने इस परिस्थिति को और जटिल बना दिया है।
इसलिए ट्रेड यूनियनों के प्रतीकात्मक प्रतिरोधों में असंगठित कामगारों और अन्य वंचित तबकों की कोई भागीदारी नहीं बन पाई है। असंगठित मजदूरों में से कई समूहों के अपने अलग संगठन हैं, लेकिन वे अपनी लड़ाई अकेले लडऩे को मजबूर रहे हैं। जब-तब थोड़ी-बहुत सफलता के अलावा ये लड़ाइयां कोई बड़ा प्रभाव अब तक नहीं छोड़ पाई हैं।
अब चूंकि किसान-मजदूर एकता का एक नया हाल में शुरू हुआ है, तो यह अपेक्षित है कि इस मुहिम के नेता उन तमाम तबकों और उनके संगठनों के साथ संवाद और सहयोग शुरू करने को प्राथमिकता दें। यह काम आसान नहीं है। लेकिन हकीकत यह है कि ऐसी व्यापक एकता के बिना आज के सत्ता तंत्र से अपनी मांगें मनवा लेना संभव नहीं है।
साल 2020-21 के अपने बहुचर्चित किसान आंदोलन के दौरान एसकेएम ने आज के दौर की लड़ाई का एक कारगर टेम्पलेट विकसित किया था। इसकी वजह यह थी कि किसान नेतृत्व ने आज की पॉलिटिक इकॉनमी के चरित्र की सही समझ दिखाई थी।
तब किसान नेतृत्व ने यह समझा था कि उस समय जो तीन कृषि कानून बनाए गए थे, उनके पीछे मकसद मोनोपॉली घरानों के हित को साधना था और संभवत: उन्हें उन्हीं घरानों की मांग या सुझाव पर तैयार किया गया था। इसीलिए तब किसानों ने कुछ राज्यों में कुछ मोनोपॉली घरानों के उत्पादों एवं सेवाओं के बहिष्कार की मुहिम भी छेड़ी थी।
किसान नेतृत्व ने यह समझा था कि लिबरल डेमोक्रेसी की संस्थाओं पर भरोसा कर वे अपनी लड़ाई नहीं जीत सकते। वे सिर्फ अपने लंबे संघर्ष पर उन्होंने भरोसा किया। इसीलिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने से इनकार कर दिया। यहां तक कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का नोटिस स्वीकार करने से भी मना कर दिया। उन्होंने तब बेलाग कहा था कि उनकी लड़ाई सरकार से है- इसमें न्यायपालिका की कोई भूमिका नहीं है। यह एक महत्त्वपूर्ण बयान था। राजनीतिक लड़ाइयों को सिर्फ राजनीति के दायरे में जीता जा सकता है, यह समझ आज के दौर में अति महत्त्वपूर्ण है।
किसान आंदोलन ने आरंभ से ही यह समझ दिखाई कि आज का मेनस्ट्रीम मीडिया मोनोपॉली कॉरपोरेट से नियंत्रित है, इसलिए उससे ऐसे संघर्ष की सही रिपोर्टिंग की अपेक्षा नहीं रखी जा सकती, जिसका सीधा अंतर्विरोध उन्हीं घरों से है।
जिस किसी आंदोलन के नेतृत्व के पास उपरोक्त समझ नहीं है, उसके आज मामूली रूप से भी सफल होने की संभावना नहीं है। चूंकि किसान नेतृत्व ऐसी समझ दिखा चुका है, इसलिए उससे यह अपेक्षा है कि वर्तमान एवं भविष्य में वह भारत के मेहनतकश आवाम को दिशा देने में महत्त्वपूर्ण योगदान कर सकेगा। दरअसल, देश की मौजूदा परिस्थिति से परेशान तमाम लोगों और समूहों को देर-सबेर उस टेम्पलेट पर गौर करना होगा, जिस पर एसकेएम ने 2020-21 में अमल किया था।
आज के जो हालात हैं, उसमें मीडिया के धुआंधार प्रचार से यह धारणा जरूर बन सकती है कि सब कुछ राम मय है और सभी लोग विकसित भारत के कथानक से मोहित हैं। मगर जमीनी स्थितियां किस तरह लगातार मुश्किल होती जा रही हैं, उसकी एक झलक युद्धग्रस्त इजराइल जाकर मजदूरी करने के लिए लोगों की लगी होड़ से मिली है। उच्च शिक्षित लोग वहां शारीरिक श्रम करने जाने की जुगत में दलालों को भारी कमीशन दे रहे हैं। वे ऐसा क्यों कर रहे हैं, यह सवाल जब एक अखबार के संवाददाता ने पूछा, तो यह आम जवाब था- यहां भूखे मरने से बेहतर वहां नौकरी करते हुए मरना बेहतर है।
तो भारत में विशाल आबादी के सामने भुखमरी जैसी समस्या है। नतीजतन, कई जगहों पर कई रूपों में असंतोष का विस्फोट होते हमने हाल में देखा है। अग्निवीर योजना के खिलाफ जिस तरह स्वत:स्फूर्त ढंग से हजारों नौजवान तोडफ़ोड़ करने पर उतर आए, वह इसका एक उदारहण था। 13 दिसंबर को देश के पांच अलग-अलग राज्यों से आए नौजवानों ने संसद भवन के अंदर और बाहर असंतोष जताने का जो (गैर कानूनी) तरीका चुना, वह इसका दूसरा उदाहरण है। हालांकि नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ चले व्यापक आंदोलन का कारण आर्थिक नहीं था, लेकिन वह मौजूदा सरकार के प्रति विरोध भाव का ही एक प्रदर्शन था। गौरतलब है कि ऐसे तमाम संघर्ष आज गतिरोध की अवस्था में हैं- यानी जिन मसलों की वजह से वे उभरे, उनका कोई समाधान नहीं हुआ है। देश में ऐसे गतिरोध के बिंदु बढ़ते जा रहे हैं।
इसलिए ऐसे संघर्ष की जरूरत है, जिसका मकसद वर्तमान पॉलिटिकल इकॉनमी को बदलना हो और जिसमें सभी मेहनतकश और असंतुष्ट तबकों की भागीदारी सुनिश्चित हो सके। मगर ऐसे आंदोलन की कुछ पूर्व शर्तें है:
इस आंदोलन को अपना संदर्भ दीर्घकालिक बनाना होगा। प्रतीकात्मक या अल्प अवधि के संघर्ष का वर्तमान सत्ता तंत्र पर कोई असर नहीं हो रहा है। इसका कारण यह है कि सियासी नैरेटिव पर उसने अपना पूरा शिकंजा कस लिया है। ऐसे में सिर्फ वैसे दृढ़ संकल्प से सफलता मिल सकती है, जैसा किसान आंदोलन ने दिखाया था।
आंदोलन के नेतृत्व को एक से दूसरे चुनाव के चक्र में सोचने की आदत छोडऩी होगी। यानी इस भ्रम से बाहर निकलना होगा कि वोट के लालच में राजनीतिक दल उनकी मांगे मान लेंगे। खासकर वैसी मांगों को मान लिए जाने की कोई संभावना चुनावी राजनीति के दायरे में नहीं है, जिनका सीधा अंतर्विरोध आज की पॉलिटिकल इकॉनमी से है।
इस लिहाज से खुद किसान आंदोलन का अनुभव बड़े काम का है। आंदोलन को आंशिक सफलता मिली, क्योंकि उसने लंबा संघर्ष किया। लेकिन उसे पूर्ण सफलता नहीं मिली, क्योंकि उसकी मांगों का सीधा अंतर्विरोध सुनियोजित ढंग से बनाई जा रही मोनोपॉली केंद्रित अर्थव्यवस्था से है और इसे बदलने के लिए जो जन शक्ति चाहिए, वह अकेले किसान नहीं जुटा सकते।
लंबे संघर्ष के कॉरपोरेट मोनोपॉली नियंत्रित अर्थव्यवस्था को बहस के केंद्र में लाने की जरूरत होगी। स्वाभाविक है कि इस अर्थव्यवस्था से लाभान्वित तबके ऐसे किसी संघर्ष का पुरजोर विरोध करेंगे। लेकिन अर्थव्यवस्था के इस स्वरूप के कारण वंचित हो रहे लोगों की विशाल संख्या है। ऐसे तमाम समूहों को एकजुट करने के अलावा अब कोई रास्ता नहीं बचा है।
चूंकि ऐसे आंदोलन का स्वरूप जन संघर्ष का होगा, इसलिए इसे आगे बढ़ाने का सबसे माफिक तरीका इसे अहिंसक रखना होगा। उसके साथ ही सत्याग्रह, सिविल नाफरमानी और असहयोग जैसे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अपनाए गए तरीकों को नए संदर्भ में फिर से अपनाने पर विचार किया जा सकता है।
किसान आंदोलन में इन तमाम रूपों की हलकी झलक मिली थी। इसके अलावा किसान आंदोलन ने अपने मीडिया पर भरोसा करने का कारगर नजरिया भी अपनाया था। इसीलिए उसे वर्तमान भारत के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में याद किया जाएगा। अब जरूरत उन तरीकों और भी बड़े दायरे में ले जाने की है।
यह निर्विवाद है कि व्यापक राजनीतिक संघर्ष के लिए परिस्थितियां लगातार परिपकव हो रही हैं। ऐसा संघर्ष, जिसके निशाने पर सीधे आज की पॉलिटिकल इकॉनमी हो। यानी वह इकॉनमी जिस पर कॉरपोरेट मोनोपॉली का शिकंजा कस गया है। और वह पॉलिटिक्स जो नफरत की राजनीति से उन मोनोपॉली हितों को साधने के लिए राजनीतिक बहुमत जुटाने में सफल हो रही है।
फिलहाल, 16 फरवरी एक प्रतीकात्मक प्रतिरोध का दिन बनेगा। लेकिन इसके लिए बनी किसान-मजदूर एकता में आगे के लिए बड़ी संभावनाएं भी छिपी हुई हैं- बशर्ते इस प्रतिरोध का नेतृत्व उनकी तलाश के लिए अपने को कृत-संकल्प करे।

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