पत्रकारों को वायरल वीडियो की खबर लिखना पडा भारी, खार खाई पुलिस ने दर्ज की एफआईआर

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अंशु गुप्ता, जिला संवाददाता

बांदा। प्रदेश की साफ स्वच्छ जीरो टालरेस की नीति को लेकर दो बार भाजपा या यूं कहें योगी सरकार पूर्ण बहुमत से सत्ता मे आई है। दोबारा सरकार बनने में सबसे बडा योगदान मीडिया का रहा जिसमे मीडिया ने सरकार के को धरातल पर जनहित में किए गए कार्यों को बखूबी आईने की तरह उतारकर प्रस्तुत किया। सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी पत्रकारों के मान एवं सम्मान हेतु एक बार नही अनेकों बार जनपद मुख्यालयों को निर्देशित कर कह चुके है कि अधिकारी, कर्मचारी एवं पुलिस पत्रकारों से सम्मान के साथ पेश आये तथा समाचार संकलित करवाने मे योगदान करें परन्तु धरातल पर मुख्यमंत्री का आदेश हवा-हवाई साबित हो रहा है। कर्मचारी-अधिकारी सम्मान देना तो दूर की बात है यदि सच्चाई लिख दिया तो मुकदमा लिखाकर जेल भेजनें की तैयारी में रहते हैं। चौथा स्तम्भ जिसे आप पत्रकार कहते है। समाज का आईना कहे जाने वाले इस स्तम्भ को जोकि अपने परिवार की देख-रेख तक नही कर पातें है, केवल खबरों की कवरेज करने के लिए ठंड, बरसात गर्मी, धूप मे सड़कों पर घूमता हुआ दिखाई पड़ जायेगा और आपको पल-पल की शासन-प्रशासन आदि की खबरों से समाज को अपडेट रखता है।
बडे ही दुख के साथ मैं अपने ही कलम से अपनी ही व्यथा लिख रहा हूँ। मुझे सच लिखने की इतनी बडी कीमत चुकानी पडी है कि कोई और होता तो आत्महत्या कर लेता। पुलिस ने मेरा मनोबल तोड़ने के लिए मेरे ऊपर इतने मुकदमे पर मुकदमे लिखे कि मेरे जैसे सीधे-सादे व्यक्ति को अपराधी बना दिया। कई गंभीर कार्यवाही मेरे खिलाफ की गयी तथा वर्षों मुझे कई यातनाएं झेलनी पडी। मेरा पूरा कैरियर पुलिस ने बरबाद कर दिया। सच्चाई लिखना कितना बडा गुनाह है यह मै भली-भाँति जान व समझ चुका हूँ।

पुलिस ने अब एक नया मुकदमा संख्या 0023/2024 थाना फतेहगंज जनपद बांदा में अंशु गुप्ता पत्रकार व शिवविलाश शर्मा के खिलाफ लिखा दिया है। चूंकि एक वीडियो पुलिस की गाडी का वायरल हुआ था जिसमें पुलिस की गाड़ी से डीजल निकाला जा रहा था। वीडियो में गाड़ी के पास कोई भी पुलिसकर्मी मौजूद दिखाई नही पड़ रहा है। इस प्रसारित व प्रचारित वीडियो की खबर मेरे द्वारा छाप दी गयी। सच्चाई बर्दाश्त करने की ताकत सब में नही होती है। आनन-फानन में पुलिस ने मेरे खिलाफ गंभीर धाराओं में एक एफआईआर दर्ज करा दी ताकि पुलिस की काली करतूतों पर एफआईआर नामक सर्फ से सफाई कर पर्दा डाला जा सके। पुलिस ने संबंधित पत्रकारों को नोटिस या सूचना देना मुनासिब नही समझा और आनन-फानन मे सभी नियम कानून तथा शासनादेशों को दरकिनार कर सीधे गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज करा दी। एफआईआर दर्ज कराने में पुलिस की जल्दबाजी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एफआईआर की तहरीर देने वालें और एफआईआर दर्ज करने वाले पुलिस के पास इतना समय नहीं था कि तहरीर को ध्यान से पढ़ लें या तहरीर की सत्यता पर छानबीन कर लें। लिखित तहरीर जिसपर सक्षम पुलिस या अधिकारी ने एफआईआर दर्ज की है वह खबर प्रकाशित करने की दिनांक तक सही से लिखना भूल गए है। ऐसी हड़बड़ी वाली परिस्थितीयां तब पैदा होती है जब शिकायतकर्ता गलत होता है और उसके मन में चोर होता है।

बांदा पुलिस जोकि हर छोटी से छोटी “गुड वर्क” को अपने एक्स (पूर्व में ट्विटर) हैन्डल पर प्रसारित करती रहती है, ने इस विडिओ से संबंधित का खंडन सिर्फ व्हाट्सअप के कुछ ग्रुप में प्रसारित किया। ऐसा क्यू किया यह आप आसानी से समझ सकते है। यह है उत्तर प्रदेश की स्मार्ट पुलिसिंग।
स्मार्ट पुलिसिंग का एक उदाहरण और लिया जा सकता है जब एक समाचार चैनल के पत्रकार विकास धीमान ने “योगी सरकार के मंत्री के पति और पूर्व सांसद की नहीं सुन रही यूपी पुलिस! धरने पर बैठे BJP नेता” शीर्षक से चैनल की वेबसाईट पर पर खबर प्रकाशित की तो खार खाई पुलिस ने पत्रकार के ही खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा लिखकर अपनी छवि को सुधारने के प्रयास किया।
ऐसी स्थिति में कौन पत्रकार सच्चाई दिखाने व बताने के नजदीक जायेगा। अगर ये कहा जाये कि अधिकारी-कर्मचारी पत्रकारों को गुलाम बना कर रखना चाहते है तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी।

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