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जलालीपुर देहात में सचिव ने बिलों में हेरफेर कर शासनादेशों की उड़ाई धज्जियां

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व्हाइटनर लगाकर 2500 रुपये के बिल को बना दिया 25 हजार, मामला खुलने पर रोका भुगतानय माँ दुर्गा इंटरप्राइजेज से मिलीभगत के आरोप

हरगांव, सीतापुर। विकास खंड हरगांव की ग्राम पंचायत जलालीपुर देहात में सरकारी धनराशि के भुगतान को लेकर गंभीर अनियमितताओं का मामला सामने आया है। यहां पंचायत सचिव राजकुमार की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि सचिव ने बिलों में व्हाइटनर लगाकर मूल धनराशि में हेरफेर किया और शासनादेशों व विभागीय निर्देशों को दरकिनार कर सरकारी धनराशि के भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। मामला संज्ञान में आने के बाद एक भुगतान को निरस्त कर रोक दिया गया।मामला झंडा खरीद से जुड़े बिल का है। जानकारी के मुताबिक, फर्म की ओर से 100 झंडों की खरीद का बिल 25 रुपये प्रति झंडे की दर से तैयार किया गया था। इस हिसाब से बिल की कुल धनराशि 2,500 रुपये बनती थी। आरोप है कि सचिव ने बिल पर व्हाइटनर लगाकर कुल रकम में हेरफेर करते हुए 2,500 रुपये को 25,000 रुपये कर दिया। इसके बाद बढ़ाई गई धनराशि का भुगतान भी लगा दिया गया। हालांकि, जैसे ही यह मामला जिम्मेदारों के संज्ञान में आया, आनन-फानन में संबंधित बिल को निरस्त कर भुगतान रोक दिया गया। इस घटना ने पंचायत में खरीदारी और भुगतान की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।इस पूरे प्रकरण में माँ दुर्गा इंटरप्राइजेज नामक फर्म की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। आरोप है कि सचिव राजकुमार और फर्म संचालक की कथित सांठगांठ से बिलों में हेरफेर का खेल किया जा रहा है। सूत्रों की मानें तो सचिव फर्म संचालक से पहले ही सादे बिल प्राप्त कर लेते हैं। इसके बाद आवश्यकतानुसार उनमें मनमाने तरीके से सामग्री और धनराशि का विवरण भरकर भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है। बताया जा रहा है कि ग्राम पंचायत के लिए तैयार किए गए कई संदिग्ध बिल इसी फर्म से लिए गए हैं।हैरानी की बात यह है कि आनन-फानन में तैयार किए गए कई बिलों पर न तो खरीद की तारीख अंकित की गई और न ही ग्राम पंचायत का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया। ऐसे में यह स्पष्ट कर पाना मुश्किल है कि किस बिल पर किस ग्राम पंचायत के लिए सामग्री की खरीद दिखाई गई और किस मद से भुगतान किया गया। सरकारी धनराशि के खर्च में पारदर्शिता के लिए बिलों पर तारीख, ग्राम पंचायत का नाम, सामग्री का विवरण और कुल धनराशि दर्ज होना आवश्यक है।सचिव की कार्यशैली को लेकर एक और गंभीर सवाल ई-ग्राम स्वराज पोर्टल पर अपलोड किए गए दस्तावेजों को लेकर उठ रहा है। आरोप है कि पोर्टल पर मूल बिल अपलोड करने के बजाय उनकी नकली प्रतियां अपलोड की गई हैं। यदि ऐसा है तो ऑनलाइन अभिलेखों और वास्तविक खरीद के दस्तावेजों में अंतर होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।अब सवाल यह है कि बिलों में व्हाइटनर लगाकर रकम बढ़ाने का प्रयास किसके संरक्षण में किया जा रहा था? एक ही फर्म से लगातार बिल लेने और उनमें आवश्यक विवरण दर्ज न होने के बावजूद भुगतान की प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ी? पूरे मामले में मूल बिलों, फर्म के अभिलेखों, भुगतान वाउचर, बैंक लेनदेन तथा ई-ग्राम स्वराज पोर्टल पर अपलोड दस्तावेजों का मिलान कर निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए, जिससे सरकारी धनराशि के वास्तविक खर्च और कथित अनियमितताओं की सच्चाई सामने आ सके।

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