योगी के सर पर अमित शाह का अंगद पैर

आचार्य श्रीहरि

भाजपा और मोदी के लिए अमित शाह अंगद हैं, जहां पर अमित शाह का पैर पड़ता है तो फिर उठता ही नहीं जीत और सफलता लेकर ही उठता है, ऐसी गारंटी बीजेपी में कभी नहीं थी। अमित शाह सभी गुणों में निपुण हैं, उन्हें मालूम है कि भूत लात के बिना मानता नहीं, इसलिए वे शक्ति का प्रयोग करने से चूकते नहीं है, हटते नहीं हैं, शाम, दंड , भय दिखाने में उनकी कोई तुलना नहीं है, कोई जोड़ नहीं है, बल्कि बेजोड़ हैं। परिस्थितियों की समझ और परख उनकी सर्वश्रेष्ठ है। इसलिए वे समय और समीकरण के अनुसार अपने मोहरे चलाते हैं, जिससे वे जीत अर्जित करते हैं, विरोधियों को पराजित करते हैं और बीजेपी को विजयी भवः कराते हैं। बीजेपी का चुनावी अहर्ताएं और रणनीतियाँ अकेले अमित शाह के कंधों पर होती हैं। सरकार और पार्टी के संकट निवारण भी यही है। खौफ इतना कि कोई अमित शाह की नजर पर चढ़ना नहीं चाहता है, नाराजगी मोल लेना नहीं चाहता है, नजर पर चढ़ना और नाराजगी मोल लेने का सीधा अर्थ बीजेपी की राजनीति में इति श्री रेवा खंडे हो जाना है। निश्चित तौर पर अमित शाह का विकल्प बीजेपी में कोई नहीं है और न ही बीजेपी में कोई अमित शाह का विकल्प होने का प्रयास करता है या पैंतरेबाजी करता है। नरेंद्र मोदी जब गुजरात में मुख्यमंत्री थे तब उन्हें अपने विरोधियों और शांति दूतों को निपटाने की जिम्मेदारी दे रखी थी, वे गुजरात के भी गृह मंत्री थे और मोदी के संकट मोचन थे। उन्होंने गुजरात में न केवल शांति दूतों को निपटाया था बल्कि गुजरात दंगों के बाद उठे देशद्रोही वेग को भी नियंत्रण में लिया था और संहिता की कसौटी पर सफाया किया था। गुजरात की उनकी कामयाबी और अनुभव का ही प्रतिफल हुआ कि उन्हें केंद्र उनकी अनिवार्यता समझी गई और मोदी ने उन्हें अपरिहार्य समझा, गृह मंत्री के पद पर उन्हें सुशोभित किया । मोदी जी को इसके लिए राजनाथ सिंह की नाराजगी लेनी पड़ी, क्योंकि राजनाथ सिंह गृहमंत्री का पद छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे।
अभी अभी अमित शाह का अंगद पैर योगी आदित्यनाथ के सर पर पड़ा है, उत्तर प्रदेश विधानसभा की चुनावी राजनीति पर अमित शाह का अंगद पैर पड़ते ही विपक्षी राजनीति और चुनावी रणनीति एक तरह से नई सोच की अनिवार्यता की परिधि में खड़ी हो गई है। अमित शाह के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव रणनीति में कूदने के पूर्व अखिलेश, मायावती, कांग्रेस आदि विपक्षी राजनीतिक पार्टियां खूब धमाल मचा रखी थी और उन्हें खुशफहमी हो गई थी कि उनकी आक्रमकता और बेलगाम बयानबाजी से योगी सरकार और बीजेपी की चुनावी राजनीति कमजोर पड़ गई है और उनकी जीत जैसी राजनीतिक परिस्थितियां बन रही है और उनके पक्ष में चुनावी हवा बहनी शुरू हो गई है। वोट चोरी का शोर के माध्यम से बीजेपी के खिलाफ बगावत उत्पन्न करने का प्रयास जारी है, राहुल गांधी के इस हथकंडे में मायावती तो नहीं फंसी पर लटकन बन कर अखिलेश यादव जरूर फंस गए। अखिलेश यादव जन मुद्दों को न उठा कर वोट चोरी का मुद्दा उठाने की आग जलाने लगे। इस कारण मीडिया में अखिलेश यादव और राहुल गांधी को दिन रात जगह जरूर मिली। मीडिया में अकारण और जनशक्ति समर्थन से अधिक जगह मिलनी शुरू होती हैं तो फिर राजनीतिज्ञ अंहकार से भर जाते हैं, खुशफहमी पर सवार हो जाते हैं। यह सही है कि वर्तमान समय में अखिलेश यादव और राहुल गांधी आदि अहंकार और खुशफहमी से भरे हुए हैं जो उनके लिए आत्मघाती भी बनेगा। इन्हें मालूम ही नहीं है कि बीजेपी की चुनावी हवा तो तब बहनों शुरू होगी है जब अमित शाह चुनावी राजनीति में कूदते है, उस पर अपना अंगद पैर रख खड़े हो जाते हैं। अमित शाह का अंगद पैर पड़ते ही बीजेपी की चुनावी राजनीति एकाएक तूफान बन जाती है, विपक्षी चुनावी राजनीति के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर देती है। निश्चित तौर पर अमित शाह के पैर पड़ते ही अखिलेश यादव और राहुल गांधी को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बढ़त की रणनीति पर कुठाराघात हुआ है, बीजेपी की आक्रामकता का अब इन्हें अहसास होना शुरू हो गया है।
अमित शाह की कितनी रणनीति उपयोगिता है और कितनी अनिवार्यता रखते हैं, इसकी पहचान और समझ योगी आदित्यनाथ को जरूर है। यही कारण है कि अमित शाह के सम्मान में कोई गुस्ताखी नहीं करते हैं, प्रेरक सम्मान देते हैं। योगी आदित्यनाथ खुद अमित शाह की आगवानी करने के लिए लखनऊ के हवाई अड्डे पर पहुंच जाते हैं। अपने साथ दोनों उप मुख्यमंत्रियों को भी योगी ले जाते हैं। मीडिया में एक तस्वीर बहुत वायरल होती है, वह तस्वीर अमित शाह, योगी, पाठक और मौर्य का साथ साथ कदम ताल मिलाकर चलना। इस तस्वीर का संदेश क्या है, इस तस्वीर का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए कोई रणनीतियां भी है क्या? इस तस्वीर का साफ संदेश है। संदेश यह है कि हम साथ साथ हैं, किसी प्रकार का कोई मतभेद नहीं है, कोई नाराजगी नहीं है, कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। मीडिया में मतभेद, नाराजगी और प्रतिस्पर्धा की खबरें आती रहती है कि उत्तर प्रदेश बीजेपी में नाराजगी भी है, मतभेद भी है और प्रतिस्पर्धा भी है, मुख्यमंत्री के पद के लिए अंदर खाने में शह मात का खेल जारी है। खासकर केशव प्रसाद मौर्य और बृजेश पाठक योगी आदित्यनाथ के बीच प्रतिस्पर्धा है। केशव प्रसाद मौर्य मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं, उनका पिछड़ा चेहरा भी प्रमुख है। यह सही है कि राजनीति में सर्वश्रेष्ठ पद पर पहुंचने की होड़ लगी रहती है। खासकर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री पद पर पहुंचने का सपना हर राजनीतिज्ञ देखता है और उसके लिए वह सक्रिय भी रहता है, तरह तरह के हथकंडे भी अपनाता है। केशव प्रसाद मौर्य भी कभी मुख्यमंत्री बनने का सपना देखा था पर पिछले विधानसभा चुनावों में वे खुद अपनी विधानसभा सीट हार गए थे। जिस कारण उनकी मुख्यमंत्री बनने और अपनी तुलना योगी आदित्यनाथ से करने की उनकी राजनीतिक शक्ति फीकी पड़ गई, कमजोर पड़ गई। केशव प्रसाद मौर्य दलबदलू जरूर है पर उन्हें बीजेपी में आए हुए काफी समय हो गया है, इस दौरान बीजेपी की राजनीति को वे समझ गए हैं। बीजेपी में शह मात का खेल नहीं चलता है, लोकप्रियता की कसौटी होती है, समर्पण की कसौटी होती है, सक्रियता की कसौटी होती है फिर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री जैसे सर्वोच्च पद मिलता है। मोदी राज में कोई भी स्वयं को बड़ा नहीं समझ सकता है, अपने आप को बड़ा घोषित नहीं कर सकता है। अनजान और हाशिय पर बैठा हुआ राजनीतिज्ञ भी सर्वोच्च पद पर बैठाया जा सकता है। इसका नितिन नबीन और द्रौपदी मुर्मू है। मोदी और शाह के सानिध्य में ही रहकर केशव प्रसाद मौर्य को अपनी भलाई समझनी चाहिए। योगी आदित्यनाथ ने अपनी सत्य निष्ठा, कठोर प्रशासन और हिंदुत्व के प्रति समर्पित राजनीति से अपनी छवि तेज बनाई है, अपना समर्थक वर्ग बनाया है, जिसकी तुलना केशव प्रसाद मौर्य या फिर बृजेश पाठक जैसे लोग नहीं कर सकते हैं।
अमित शाह ने कार्यकारणी की बैठक सभा में योगी आदित्यनाथ को लेकर साफ संदेश भी दे दिया। कोई एक बार नहीं बल्कि कई बार उन्होंने योगी की प्रशंसा की है। अमित शाह द्वारा योगी आदित्यनाथ की प्रशंसा अकारण नहीं है, बेअर्थ नहीं है। योगी आदित्यनाथ अपने कार्यों और कठोर नीतियों से मोदी और शाह को प्रभावित किया है। खासकर अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसे दुर्दांत अपराधियों को ऊपर पहुंचाकर कर वीरता दिखाई है, मुस्लिम गुंडागर्दी को कब्र बना डाली। अमित शाह का चुनावी श्रीगणेश करने और योगी की प्रशंसा करने का प्रतिफल साफ दिखाई पड़ा है। नौकरशाही के भ्रष्टाचार से बीजेपी के कार्यकर्ता जरूर नाराज और आक्रोशित रहे हैं, सिर्फ कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि विधायक और सांसद भी आक्रोशित रहे हैं। अब कार्यकर्ता, विधायक और सांसद भी अमित शाह के आदेश और संदेश पर योगी योगी करने लगे हैं। सभी को मालूम है कि योगी का विरोध करने का अर्थ आत्मघात करना है और अखिलेश, राहुल गांधी जैसे हिंदू विरोधियों की सत्ता स्थापित करना है। भूत काल में भाजपा के लोगों ने अखिलेश यादव और राहुल गांधी का हिंदू विरोधी सत्ता और विभक्त मुस्लिम राजनीति देखी है। बीजेपी के नाराज कार्यकर्ता अब सक्रिय हो गए हैं। बीजेपी अब आक्रामक भी हुई है और सक्रिय भी हुई है। बीजेपी के लोग अब चुप्पी तोड़कर सपा, कांग्रेस की खबर लेना शुरू कर दिए हैं, अखिलेश और राहुल गांधी के हिंदू विरोधी राजनीति को उजागर करना शुरू कर दिए हैं। बीजेपी की यह आक्रामकता अमित शाह की हुंकार के बाद आई है।
अखिलेश यादव और राहुल गांधी अभी भी जहां वोट चोरी और मुस्लिम परस्त की राजनीति में लगे हुए हैं वही अमित शाह उम्मीदवारों की पहचान करने और अपनी कमजोरियों को दूर करने में लगे हुए हैं। अमित शाह की इसी खूबी से विपक्ष पराजित होता है।

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